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Ramayan ki dharmik kahani- रामायण की 3 नई पौराणिक कथाएं

आज आपके लिए हम रामायण की तीन रोचक और शिक्षाप्रद नई पौराणिक धार्मिक कहानी लाए है।तो चलिए अब Ramayan ki dharmik kahani को शुरू करते है।


एक बार माता कैकई अपने महल मे बैठी थी।तभी श्री रामचन्द्र जी माता कैकई के पास आते है।

रामचन्द्र जी को देख कर माता कैकई बहुत खुश हो जाती है। चूंकि कैकई माता ने रामचन्द्र जी को जन्म नहीं दिया था परन्तु वह रामचन्द्र जी को उनकी माता कौशल्या से कम प्रेम नहीं करती थी। रामचन्द्र जी ने माता कैकई को कहा कि वह देवताओ का कार्य करना चाहते है।

धर्म की स्थापना करना चाहते है।और यह काम वह महल में रहकर नहीं कर सकते इसके लिए उन्हे जंगल जाना होगा।यह सुनकर माता कैकई बहुत दुखी हो गई। रामजी ने उन्हे फिर कहा कि मां आप पिताजी(दशरथ जी) से दो वरदान मांगना की जिसमे मुझे वन जाना पड़े और भरथ को राज्य मिले।

माता कैकेई बिल्कुल भी राजी नहीं हुई क्यूंकि उसकी आत्मा उसे ऐसा करने के लिए इजाजत नहीं दे रहा था. रामजी फिर का उठे माता यश तो सभी चाहते है।पर जो सत्य की स्थापना के लिए अपयश लेने के लिए तैयार रहते है।ऐसी आप ही हो।मेरे मानव जन्म को बेकार मत जाने दो माता!

जब माता कैकई ने इतना सुना तो वह अपयश लेने के लिए तैयार हो गई। और उन्होने महाराज दशरथ से दो वरदान मांगे। जिसमे रामजी को वन और भरथ को राज्य मांगा। माता कैकई किसी भी प्रकार से गलत नहीं थी।बल्कि वह तो बहुत महान थी।

हनुमानजी और भरथ का प्रेम मिलन

हम सभी को पता है कि हनुमानजी बल की सीमा है।हनुमानजी की तरह सिर्फ वह है और कोई नहीं। श्री रामचन्द्र जी का कार्य करने लिए उनका जन्म हुआ था। जब भैया लक्ष्मण को शक्ति बान लगी थी।तब वह मूर्छित हो गए थे।तभी हनुमान बाबा संजीवनी जड़ी बूटी लाने के लिए उत्तर की ओर जाते है। हनुमानजी संजीवनी बूटी के पूरे पहाड़ को उठा कर चल देते है।

जब वह अयोध्या के ऊपर से गुजर थे,तभी भैया भरत की नजर उन पर पड़ी। दरअसल भारत जी ने हनुमानजी के भीतर श्री रामजी को देखा था। और वह हनुमानजी के भीतर अपने रामजी का दर्शन करना चाहते थे। इसीलिए उन्होने बान चलाया था।अगर उन्हे लगता कि कोई दैत्य अयोध्या से जा रहा है।

तो वह बिना फर का बान नहीं फर वाला बान चलाते। बिना फर के बान ने जैसे हनुमानजी को छुआ तो वह जमीन पर आ गए। भरत जी ने उनसे गले लग कर मिलते है।भरथ जी को ऐसा लग रहा था। जैसे वह रामजी से ही मिल रहे हो।हनुमानजी ने रामजी के बारे में बताया।

साथ ही यह भी बताया की लक्ष्मण को शक्ति लगी है। भरत जी ने हनुमानजी से कहा कि आप पर्वत लेकर मेरे तीर पर बैठ जाए। मै पल भर मे पर्वत समेत आपको रामजी के पास पहुंचा दूंगा। तभी हनुमानजी सोचने लगे कि मेरे वजन से तीर कैसे चल सकता है। परन्तु रामजी का स्मरण करते ही उन्हे पता लग गया कि भरत तो राम नाम का निरंतर जप करते है।श्री रामजी का प्रेम है भरत तब वे समझ गए कि भरत जी सही कह रहे है।

माता कौशल्या और बेटो का वार्तालाप

रामजी को वनवास हो चुका था भरत जी पूरी अयोध्या के लोगो के साथ चित्रकूट से आ भी चुके थे। वह रामजी की पादुका लेकर अयोध्या आ गए थे। भरत जी अपने कुलगुरू वसिष्ठ जी से कहते है कि वह राजमहल में रहना नहीं चाहते। वह नंदीग्राम नामक स्थान वन में कुटिया बना कर रहना चाहते है। वसिष्ठ जी जानते थे कि जब तक रामजी वन में रहेंगे।

तब तक भरत राजमहल में नहीं रह सकते।इसलिए उन्होने उन्हे नंदीग्राम में रहने के लिए आज्ञा तो से दी। परन्तु यह भी बताया कि आप माता कौशल्या से भी आज्ञा मांग ले नहीं तो आपकी राम भक्ति सफल नहीं होगी। भरत जी माता कौशल्या के पास आते है। और नंदीग्राम में निवास करने की आज्ञा मांगते है। चूंकि राम वन में थे.

और भरत भी महल छोड़ कर जाने की बात कर रहे थे। लेकिन माता कौशल्या को पता था कि अगर भरत जी को रोक लिया गया तो उनके प्राण पर संकट आ सकता है। उन्हे आज्ञा दे देती है भरत जी नंदीग्राम की ओर चल देते है।

उसी समय महल के एक खंभे को पकड़ कर शत्रुघ्न रो रहे थे। जैसे ही माता कौशल्या की नजर शत्रुघ्न पर पड़ी। माता कौशल्या ने उन्हे गले लगा लिया और समझाने लगी। शत्रुघ्न बोले कि माता रामजी वन में है।भरथ भैया भी नंदीग्राम चले गए।माता मै कहां जाऊं।इतना कह कर भरथ जी फुट फुट कर रोने लगे।

आपको यह Ramayan ki nai pauranik kahani कैसी लगी? हमे आप अपनी राय या विचार इस भगवान की पौराणिक कहानियां पर जरूर बताएं।
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